यात्रा मार्गदर्शन
भर्तृहरि गुफा, गढ़कालिका मंदिर के पास, शिप्रा नदी तट, उज्जैन, मध्य प्रदेश 456006, भारत
- आने का उत्तम समय
- अक्टूबर से मार्च, जब मौसम सुहावना रहता है। सुबह का समय सबसे शांत होता है और गुफाओं के भीतर हवा भी ताज़ा रहती है।
- कितना समय रखें
- 30 से 45 मिनट; भीड़ के दिनों में एक घंटा रखें।
- प्रवेश शुल्क
- अधिकांश विवरणों के अनुसार निःशुल्क। दान स्वैच्छिक है।
- वेशभूषा
- कोई औपचारिक वेशभूषा नियम प्रकाशित नहीं है। कंधे और घुटने ढकने वाले शालीन वस्त्र उचित हैं, और जूते-चप्पल मंदिरों के बाहर उतारे जाते हैं।
- फोटोग्राफी
- इस बारे में विवरण अलग-अलग हैं। कम से कम एक यात्री के अनुसार गुफाओं के भीतर फोटो खींचना मना है। चित्र लेने से पहले साधुओं से पूछ लें, और बिना अनुमति साधुओं के चित्र न लें।
कैसे पहुँचें
- रेल से
- पश्चिम रेलवे का उज्जैन जंक्शन (UJN) निकटतम स्टेशन है, गुफा से लगभग 4 किमी। स्टेशन के बाहर ऑटो और ई-रिक्शा मिल जाते हैं।
- हवाई मार्ग से
- इंदौर का देवी अहिल्याबाई होलकर हवाई अड्डा निकटतम है, उज्जैन से लगभग 53 से 55 किमी। इंदौर से उज्जैन के लिए टैक्सी और बसें चलती हैं।
- सड़क से
- उज्जैन सड़क मार्ग से इंदौर से लगभग 53 किमी और भोपाल से 183 किमी है; इंदौर, भोपाल, रतलाम, कोटा और ओंकारेश्वर से नियमित बसें मिलती हैं। गुफा पर वाहन खड़ा करने की जगह है।
- शहर के भीतर
- महाकालेश्वर मंदिर से गुफा उत्तर दिशा में लगभग 3.5 से 4.5 किमी है, ऑटो, ई-रिक्शा या टैक्सी से 10 से 15 मिनट। गढ़कालिका मंदिर से यह एक किलोमीटर से कम की छोटी सवारी या पैदल दूरी पर है।
दर्शनार्थियों के लिए सुझाव
- प्रवेशद्वार बहुत सँकरा है और छत नीची है, कक्षों में लगभग सात-आठ फुट और सीढ़ियों पर उससे भी कम। झुककर और धीरे-धीरे चलें।
- भीतर हवा का आवागमन सीमित है और धूनी का धुआँ बना रहता है। दमा, साँस की तकलीफ़ या बंद जगह से घबराहट वाले लोग प्रवेश के पास ही रहें या नीचे के कक्षों में न जाएँ।
- सीढ़ियाँ खड़ी और ऊबड़-खाबड़ हैं। बुज़ुर्ग और घुटनों या चलने-फिरने की परेशानी वाले लोग सहारा लें या परिसर को ऊपर से ही देखें।
- भीतर बिजली की रोशनी है, पर मद्धम है। मोबाइल की टॉर्च काम आती है।
- आना और जाना एक ही सँकरे द्वार से होता है, इसलिए छुट्टियों और पर्वों पर कतार लग जाती है। कार्यदिवस की सुबह सबसे सुविधाजनक है।
- यहाँ रहने वाले नाथ साधुओं के प्रति आदर रखें। उनका वेश और साधना अपरिचित लग सकती है; उन्हें आदेश कहकर प्रणाम करें और ध्यान में बैठे साधुओं को न छेड़ें।
- इस यात्रा को गढ़कालिका, पीर मत्स्येंद्रनाथ, काल भैरव, मंगलनाथ और सांदीपनि आश्रम के साथ जोड़ें, जो नगर के इसी ओर स्थित हैं।
आसपास के दर्शनीय स्थल
- 0.5 किमीपीर मत्स्येंद्रनाथ
शिप्रा तट पर गोरखनाथ के गुरु मत्स्येंद्रनाथ को समर्पित स्थान; हिंदू और मुसलमान दोनों इसे श्रद्धा से मानते हैं।
- 0.7 किमीगढ़कालिका मंदिर
देवी कालिका का प्राचीन मंदिर, जिनकी उपासना परंपरा के अनुसार महाकवि कालिदास करते थे; दोनों नवरात्रियों में यहाँ भारी भीड़ रहती है।
- 2.5 किमीकाल भैरव मंदिर
भैरवगढ़ में उज्जैन के रक्षक देवता का मंदिर, जिसका उल्लेख स्कंद पुराण के अवंती खंड में है।
- 3 किमीसांदीपनि आश्रम
वह आश्रम जहाँ परंपरा के अनुसार श्रीकृष्ण, बलराम और सुदामा ने गुरु सांदीपनि से शिक्षा पाई।
- 4 किमीमंगलनाथ मंदिर
शिप्रा तट पर शिव मंदिर, जिसे मंगल ग्रह की जन्मभूमि माना जाता है; मंगल दोष निवारण पूजा के लिए प्रसिद्ध।
- 4 किमीसिद्धवट
शिप्रा तट का पवित्र वटवृक्ष, जहाँ पितरों के निमित्त कर्म किए जाते हैं।
- 4 किमीमहाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग
बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक और उज्जैन का प्रधान मंदिर।
- 4 किमीहरसिद्धि मंदिर
महाकालेश्वर के निकट शक्तिपीठ, जो अपने दो ऊँचे दीपस्तंभों के लिए प्रसिद्ध है; सम्राट विक्रमादित्य से जुड़ा हुआ।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भर्तृहरि गुफा कहाँ है?
यह उज्जैन के उत्तरी भाग में शिप्रा नदी के तट पर गढ़कालिका मंदिर के पास है, उज्जैन जंक्शन से लगभग 4 किमी और महाकालेश्वर मंदिर से करीब 3.5 से 4.5 किमी दूर।
भर्तृहरि कौन थे?
भर्तृहरि शतकत्रय के संस्कृत कवि हैं। परंपरा उन्हें उज्जैन के राजा और विक्रमादित्य के भाई के रूप में याद करती है, जिन्होंने राजगद्दी त्यागकर गोरखनाथ से दीक्षा ली और नाथ योगी बने। इतिहासकार कवि का समय लगभग पाँचवीं शताब्दी ईस्वी मानते हैं और राजा वाली कथा को किंवदंती मानते हैं।
दर्शन का समय क्या है?
कोई आधिकारिक समय-सारणी प्रकाशित नहीं है। अधिकांश विवरणों के अनुसार गुफाएँ सुबह 6 बजे खुलती हैं; बंद होने का समय स्रोत के अनुसार शाम 7, 8 या रात 9 बजे बताया गया है। सुबह 6 से शाम 6 बजे के बीच जाना सुरक्षित रहेगा।
क्या प्रवेश शुल्क लगता है?
अधिकांश यात्रा-विवरण प्रवेश निःशुल्क बताते हैं। एक पुराने हिंदी लेख में शुल्क का उल्लेख था, इसलिए थोड़े खुले पैसे साथ रखें; चढ़ावा और गौशाला में सहयोग स्वैच्छिक है।
यहाँ कितनी गुफाएँ हैं?
दर्शनार्थियों को दो गुफाएँ दिखाई जाती हैं: भूमिगत कक्षों वाली भर्तृहरि की मुख्य गुफा और गोपीचंद की छोटी गुफा। कुछ विवरण तीन गुफाएँ गिनते हैं।
ये गुफाएँ कितनी पुरानी हैं?
पत्थर की यह संरचना सामान्यतः लगभग दसवीं या ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी, यानी परमार काल, की मानी जाती है, जिसका बाद में जीर्णोद्धार हुआ। परंपरा भर्तृहरि का यहाँ निवास इससे बहुत पहले, विक्रमादित्य के युग में मानती है; यह आस्था का विषय है, पुरातात्विक काल-निर्धारण का नहीं।
गुफा में दिखाया जाने वाला हाथ का निशान क्या है?
परंपरा के अनुसार इंद्र ने भर्तृहरि की तपस्या भंग करने के लिए वज्र से प्रहार किया या शिला गिराई, और योगी ने उसे एक हाथ से रोक लिया। उनके आसन के ऊपर की शिला पर बना निशान उसी पंजे के रूप में पूजा जाता है।
क्या बुज़ुर्गों और बच्चों के लिए यहाँ जाना सुरक्षित है?
ऊपर का परिसर सबके लिए सुगम है। गुफाओं में द्वार सँकरा, सीढ़ियाँ खड़ी, छत नीची और ताज़ी हवा कम है, इसलिए साँस की तकलीफ़, बंद जगह से घबराहट या चलने में कठिनाई वाले लोगों के लिए भीतर जाना उचित नहीं। बच्चों को पास रखें।
गुफा की व्यवस्था कौन देखता है?
यह स्थान नाथ संप्रदाय के साधुओं की देखरेख में है, जिनका यहाँ मठ है; वे ही धूनी की सेवा और पूजा-अर्चना करते हैं।
भर्तृहरि की समाधि कहाँ है?
इस बारे में परंपराएँ अलग-अलग हैं। उज्जैन की गुफा उनकी तपस्थली के रूप में पूजी जाती है, और कुछ लेखक यहाँ समाधि की भी बात करते हैं। बाबा भरथरी की सबसे प्रसिद्ध समाधि राजस्थान के अलवर ज़िले में सरिस्का की पहाड़ियों में है, और वाराणसी के पास चुनार में भी भरथरी का स्थान है।