गुफाओं का इतिहास
ये गुफाएँ उज्जैन के सबसे पुराने भाग, गढ़ क्षेत्र में शिप्रा के ऊँचे तट पर स्थित हैं, जहाँ कभी प्राचीन उज्जयिनी नगरी बसी थी। अधिकांश विवरण और हिंदी विकिपीडिया का उज्जैन पर्यटन संबंधी लेख इस संरचना को लगभग ग्यारहवीं शताब्दी का मानते हैं और इसे किसी पुराने भवन का अवशेष बताते हैं, जिसका बाद के काल में जीर्णोद्धार हुआ। कई लेखक इसे परमार काल के दो मंज़िला मठ का बचा हुआ भाग कहते हैं, और कुछ यहाँ लगे जैन शैली जैसे शिल्पखंडों के आधार पर इससे भी पुराने विहार की संभावना जताते हैं।
सन् 1801 में विलियम हंटर के अंग्रेज़ी विवरण में भी यहाँ के धँसे हुए आँगन, पत्थर के स्तंभों की कतारों और भारी शिलाओं से बने छोटे भूमिगत कक्षों का उल्लेख मिलता है। लगभग चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी तक यह स्थान नाथ योगियों की गद्दी बन चुका था और तब से उन्हीं की देखरेख में है।

राजा भर्तृहरि और अमरफल की कथा
परंपरा के अनुसार भर्तृहरि उज्जैन के राजा थे और विक्रमादित्य के बड़े भाई, या सौतेले भाई, थे। सबसे प्रसिद्ध कथा कहती है कि एक महात्मा ने, जिन्हें कई कथाओं में स्वयं गुरु गोरखनाथ बताया जाता है, राजा को चिर यौवन देने वाला फल दिया। अपनी रानी पिंगला पर अत्यंत आसक्त भर्तृहरि ने वह फल उसे दे दिया।
रानी ने उसे उस पुरुष को दे दिया जिससे वह गुप्त प्रेम करती थी, उसने एक गणिका को दिया, और गणिका ने राजा को ही सबसे योग्य मानकर फल फिर राजमहल पहुँचा दिया। फल को लौटा देख राजा समझ गए कि आसक्ति ने किस तरह सबको बाँध रखा है, और उनका मन संसार से उठ गया। एक अन्य कथा में शिकार का प्रसंग जुड़ता है, जिसमें गोरखनाथ ने मारे गए हिरण को जीवित कर राजा की आँखें खोल दीं।
भर्तृहरि राज्य विक्रमादित्य को सौंपकर योगी बन गए। ये श्रद्धा की कथाएँ हैं, लिखित इतिहास नहीं।
बारह वर्ष की तपस्या: इंद्र, गोपीचंद और बंद सुरंग
श्रद्धालुओं की मान्यता है कि भर्तृहरि ने नीचे के कक्ष में बारह वर्ष तक ध्यान लगाया। परंपरा के अनुसार इस तपस्या के तेज से इंद्र भयभीत हो गए और उन्होंने योगी पर अपने वज्र से प्रहार किया, या एक विशाल शिला गिराई; कहा जाता है कि भर्तृहरि ने गिरती शिला को एक हाथ उठाकर रोक लिया। उनके आसन के ऊपर की शिला पर बना निशान दर्शनार्थियों को उसी हाथ के पंजे के रूप में दिखाया जाता है।
पास की छोटी गुफा गोपीचंद के नाम से जानी जाती है, जिन्हें नाथ कथाओं में भर्तृहरि का भानजा, उनकी बहन मैनावती का पुत्र, माना जाता है और जिन्होंने भी राजगद्दी त्याग दी थी। लोक-विश्वास में एक सुरंग की भी चर्चा है, जो अब जाली से बंद है और जिसके बारे में कहा जाता है कि वह चारों धाम या वाराणसी के पास चुनार तक जाती थी। ऐसी किसी सुरंग का कोई प्रमाण दर्ज नहीं है; यह इस स्थान की लोककथा का अंग है।
भीतर क्या दिखता है
दक्षिण भारतीय शैली के सोपानदार शिखर वाला प्रवेशद्वार, जो हाल का निर्माण है, परिसर में ले जाता है। आँगन से एक सँकरा द्वार और खड़ी पत्थर की सीढ़ियाँ मुख्य गुफा में उतरती हैं। कक्ष छोटे और नीचे हैं, लगभग सात-आठ फुट ऊँचे, जिनकी छत बड़ी शिलाओं से बनी है और नक्काशीदार स्तंभों पर टिकी है; दीवारों में पुरानी मूर्तियाँ और मंदिरों के खंड जड़े हैं।
सबसे भीतरी कक्ष में भर्तृहरि की प्रतिमा, शिवलिंग और धूनी है। गोपीचंद की दूसरी गुफा पास ही है। ऊपर परिसर में नवनाथ मंदिर, मत्स्येंद्रनाथ, काल भैरव और अन्य देवताओं के स्थान, पूर्व नाथ महंतों की समाधियाँ और एक गौशाला है। ये कक्ष चट्टान काटकर बने हैं या पत्थर की चिनाई से, इस पर यात्रियों के विवरण अलग-अलग हैं; पुराने वर्णन नदी-तट में बनी पत्थर की चिनाई की ओर संकेत करते हैं।

कवि भर्तृहरि: नीति, शृंगार और वैराग्य शतक
भर्तृहरि का नाम मुख्यतः शतकत्रय के कारण अमर है, जो लगभग सौ-सौ श्लोकों के तीन संस्कृत संग्रह हैं। नीति शतक सदाचार, विद्या, मित्रता, धन और ज्ञानी तथा मूर्ख के स्वभाव की बात करता है। शृंगार शतक प्रेम और सौंदर्य पर, और मन पर उनकी गहरी पकड़ पर ठहरता है।
वैराग्य शतक इन सबसे मुँह मोड़कर संतोष, वन-जीवन और शिव-भक्ति की महिमा गाता है। श्लोक छोटे, चुटीले और सहज याद हो जाने वाले हैं, इसीलिए आज भी घरों और कक्षाओं में दोहराए जाते हैं। विद्वान कवि का समय लगभग पाँचवीं शताब्दी ईस्वी मानते हैं और बताते हैं कि पांडुलिपियों में बहुत अंतर है, करीब दो सौ श्लोक सभी में समान मिलते हैं।
परंपरा मानती है कि इनमें से कुछ रचनाएँ इसी गुफा में हुईं। कवि भर्तृहरि और वाक्यपदीय के रचयिता वैयाकरण भर्तृहरि एक ही व्यक्ति थे या नहीं, यह प्रश्न आज भी विवाद का विषय है।
भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्तास्तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः ।
कालो न यातो वयमेव यातास्तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः ॥
भोगों को हमने नहीं भोगा, भोगों ने ही हमें भोग लिया; तप हमने नहीं तपा, हम ही तप गए; समय नहीं बीता, हम ही बीत गए; तृष्णा बूढ़ी नहीं हुई, हम ही बूढ़े हो गए।
नीति शतक
सदाचार, विद्या, मित्रता, धन और ज्ञानी तथा मूर्ख के स्वभाव की बात करता है।
शृंगार शतक
प्रेम और सौंदर्य पर, और मन पर उनकी गहरी पकड़ पर ठहरता है।
वैराग्य शतक
इन सबसे मुँह मोड़कर संतोष, वन-जीवन और शिव-भक्ति की महिमा गाता है।
गुफा में नाथ परंपरा
नाथ संप्रदाय योगियों की एक शैव परंपरा है, जो आदिनाथ शिव से मत्स्येंद्रनाथ और गोरखनाथ के माध्यम से अपनी शृंखला मानती है, और भरथरी नाथ इसके महान सिद्धों में गिने जाते हैं। उज्जैन का गढ़ क्षेत्र इस परंपरा से गहराई से जुड़ा है: पीर मत्स्येंद्रनाथ का स्थान इसी नदी-तट पर थोड़ी दूरी पर है, और माना जाता है कि गोरखनाथ ने यहीं साधना की तथा भर्तृहरि को दीक्षा दी। नाथ साधु परिसर में निवास करते हैं, धूनी की सेवा करते हैं जिसकी भस्म श्रद्धालु विभूति के रूप में ग्रहण करते हैं, और नित्य पूजा संपन्न करते हैं।
अन्य स्थानों के नाथ साधु भी, विशेषकर पर्वों के आसपास, गुफाओं के बाहर डेरा डालकर साधना करते हैं। सितंबर 2023 में गोरखपुर के गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ ने यहाँ आकर पूजा-अर्चना की, जैसा ज़ी न्यूज़ ने बताया। नाथ अनुयायियों के लिए यह गुफा सिद्धपीठ है, एक सिद्ध योगी की साधना से पवित्र हुआ स्थान।
लोग यहाँ क्यों आते हैं
यह गुफा उज्जैन के बड़े मंदिरों से अलग है। यहाँ न भव्य गर्भगृह है, न अधिक कर्मकांड; दर्शनार्थी सीढ़ियाँ उतरकर एक छोटे, मद्धम रोशनी वाले कक्ष में पहुँचता है और उस जगह खड़ा होता है जहाँ, परंपरा के अनुसार, एक राजा ने राज्य के स्थान पर मौन को चुना। तीर्थयात्री भर्तृहरि और धूनी के दर्शन के लिए आते हैं, संस्कृत के पाठक शतकों के कारण आते हैं, और बहुत से लोग बस कुछ शांत क्षण बैठने के लिए।
यह स्थान जो संदेश देता है, कि प्रेम, सत्ता और धन टिकते नहीं और शांति भीतर ही मिलती है, वह हर पृष्ठभूमि के व्यक्ति को छूता है। यहाँ की यात्रा प्रायः गढ़कालिका, काल भैरव, पीर मत्स्येंद्रनाथ, मंगलनाथ और सांदीपनि आश्रम के साथ की जाती है, जो सभी नगर के इसी उत्तरी भाग में हैं। नीचे बहती शिप्रा और परिसर के पुराने वृक्ष यहाँ की शांति को और गहरा करते हैं।

एक नज़र में
- स्थान
- शिप्रा नदी का तट, गढ़कालिका मंदिर के पास, उज्जैन, मध्य प्रदेश
- किनसे जुड़ी है
- राजा भर्तृहरि (भरथरी), शतकत्रय के कवि और नाथ परंपरा के पूज्य योगी
- संप्रदाय
- नाथ संप्रदाय (मत्स्येंद्रनाथ और गोरखनाथ की परंपरा)
- संरचना का काल
- सामान्यतः लगभग 10वीं-11वीं शताब्दी ईस्वी (परमार काल) की मानी जाती है
- गुफाएँ
- दो प्रमुख गुफाएँ, भर्तृहरि की और गोपीचंद की (कुछ विवरण तीन गिनते हैं)
- प्रवेश
- अधिकांश यात्रा-विवरणों के अनुसार निःशुल्क
- उज्जैन जंक्शन से दूरी
- लगभग 4 किमी
- महाकालेश्वर से दूरी
- सड़क मार्ग से लगभग 3.5 से 4.5 किमी